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योग दर्शन में ध्यान का हमारे जीवन में प्रभाव: एक व्याकरणिक एवं दार्शनिक अनुशीलन
डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, खगेश कुमार राजवाडे़
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सारांश:
योग एक कला को अभिव्यक्त करता है। योग के माध्यम से मनुष्य के भीतर निहित कला प्रकट होती है। योग को योग-अनुशासन का आधारभूत स्तंभ माना गया है। समाधि वह साधन है जो चित्त की समस्त अवस्थाओं को धारण करती है। सत्य की अनुभूति के लिए योग का अभ्यास अनिवार्य है। योग-दर्शन की उपयोगिता वैदिक तथा अवैदिक दोनों परंपराओं में स्वीकार की गई है। ’योग’ शब्द का अर्थ है जीवात्मा (’जीवात्मा’) का परमात्मा (ईश्वर, ’परमात्मा’ के साथ मिलन। योग के द्वारा योगी अत्यंत बड़े और अत्यंत पीड़ादायक दुःखों से भी विचलित नहीं होते। जिस प्रकार मनुष्य पहले अपने मन में किसी वस्तु की कल्पना करता है और फिर उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है। उसी प्रकार उस प्रक्रिया में योग का अत्यधिक महत्व है। इसका परिणाम आध्यात्मिक शक्ति है। आध्यात्मिक शक्ति के विकास से मनुष्य अनेक कठिनाइयों का सामना करने के लिए सदैव तत्पर्य रहता है। योग का अभ्यास पूर्णतः आध्यात्मिक चिन्तन पर आधारित है। उसी प्रकार से योग दर्शन में ध्यान के विषय की ओर चित्तवृत्तियों का निरंतर, प्रवाह ’ध्यान’ कहलाता है। यह निरंतरता जलधारा की भाँति प्रवाहित होती है। यह अविच्छिन्न रहती है क्योंकि मन सांसारिक इच्छाओं से पूर्णतः मुक्त होता है। अंततः जब चित्तवृत्तियाँ बाहर की ओर प्रवृत्त नहीं होतीं, तब मन की अंतर्मुखी और एकाग्र प्रवृत्ति ध्यान के लिए अत्यंत आवश्यक हो जाती है। किंतु कला का अपना स्वतंत्र स्वरूप है। व्याकरणिक एवं दार्शनिक दृष्टि से मानव-अभिव्यक्ति में ध्यान का महत्वपूर्ण स्थान है। जबकि योग मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अनुभव का आंतरिकीकरण करने का साधन है।
मुख्य शब्द: जीवात्मा, परमात्मा, ध्यान, एकाग्र, ध्यान, मानसिक, इष्टदेव आदि।
How to Cite:
[1] डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, खगेश कुमार राजवाडे़, “योग दर्शन में ध्यान का हमारे जीवन में प्रभाव: एक व्याकरणिक एवं दार्शनिक अनुशीलन,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13734
